Short Notes About English & Hindi Writing for Kids
Books: Our best friends
Our choice of books reflects our personality and our intellect. Books tell us about new things and enrich our knowledge. They open the doors to a beautiful world and quicken our imagination. They give us company and drive away our boredom. They are friends to the ones who are lonely. They also act as companions to the deserted. They brighten our lives by giving joy to the ones who are joyless and give happiness and pleasure. Books are our true friends because they make us better, wiser and happier.
My Favourite Festival
The festival that I like the most is Diwali. We celebrate it either in October or in November. In Gujarat, it is celebrated for five days. Every house is decorated with rangoli and oil lamps. We start preparing for Diwali a few weeks in advance by cleaning our houses. Sweets and savouries are made and new clothes are bought for everyone. We celebrate it with a lot of pomp and festivity. I love Diwali because we enjoy bursting crackers, visiting our relatives and having lots of fun with our near and dear ones.
Sardar Bhagat Singh
Bhagat Singh is a memorable name is the freedom fight of India. He was the youngest freedom fighter who was executed at the age of 23 only. He was from a family full of revolutionary leaders and freedom fighters. At a very young age, he decided to sacrifice his life for the freedom of the country. He was born on 28th September 1907 in a small village in Punjab province of British India. He was a student of National College, Lahore in 1923. Bhagat Singh is an idol for the youth of India. He was the one who has the biggest contribution to have independent India.
Nature: A god gift for us.
Nature is the most beautiful creation of God which provides shelter to all the living creatures on earth. It is eternal. We are born in the lap of nature and finally blend with it as we depart.
Nature makes our life colourful. Nature is a home for all, which gives everything it can, to serve us and never asks for anything in return. It is the best teacher and source of inspiration to all. Nature surrenders its life to serve others. Without it life is beyond imagination. It helps us in every aspect of life. It gives us the valuable oxygen to breathe, food to eat and shelter in its arms. At times when we feel depressed broken or defeated it refreshes us with new positive energy. Nature has proved its importance in today’s world. Many people suffer from depression and other disorders as they are away from nature.
With best friends, you may not be having a blood relation, but they are still like your sibling. If you gain such a friend in your life, make sure to keep her for the rest of your life.
Time is Precious
Importance of English
Sisters and Brothers of America
स्वामी विवेकानंद
विश्वभर में ख्याति प्राप्त संत, स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। वह बचपन में नरेन्द्र नाथ दत्त के नाम से जाने जाते थे। इनकी जयंती को भारत में प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में मनाया जाता है। वह होशियार विद्यार्थी थे, हालांकि, उनकी शिक्षा बहुत अनियमित थी। वह बहुत धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति थे और अपने संस्कृत के ज्ञान के लिए लोकप्रिय थे।
एक दिन वह श्री रामकृष्ण (दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी) से मिले, तब उनके अंदर श्री रामकृष्ण के आध्यात्मिक प्रभाव के कारण बदलाव आया। श्री रामकृष्ण को अपना आध्यात्मिक गुरु मानने के बाद वह स्वामी विवेकानंद कहे जाने लगे। स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषणों द्वारा पूरे विश्व भर में भारत तथा हिंदु धर्म का नाम रोशन किया। वह एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनके जीवन से हम सदैव कुछ ना कुछ सीख ही सकते हैं। यहीं कारण है कि आज भी युवाओं में इतने लोकप्रिय बने हुए हैं। यदि हम उनके बताये गये बातों पर अमल करें, तो हम समाज से हर तरह की कट्टरता और बुराई को दूर करने में सफल हो सकते हैं।
पुलिस अधिकारी के रूप में मेरा स्वप्न-
मैं एक पुलिस अधिकारी बनकर अपने समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूं। मैं इस समाज को भय मुक्त कराना चाहता हूं। भारत की पुलिस सेना का नाम सुनते ही अपराधियों के रोंगठे खड़े हो जाएं। यदि सभी परिस्थितियां मेरा साथ देती हैं और मैं एक बड़ा पुलिस अधिकारी बनती हूं तो हमारे देश को मैं फिर से सोने की चिड़िया में बदल दूंगा जहां शत्रु हमारे देश की ओर आंख उठाकर भी ना देख पाएंगे।
“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। “मैं एक पुलिस अधिकारी के रूप में अपने देश के लिए जो कुछ संभव हुआ, वह करने को तैयार हूं। इसी बात पर मुझे कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की पंक्तियॉं याद आती हैं -‘हे माली! मुझे तोड़कर उस मार्ग पर फेंक देना जिस राह से मातृभूमि पर शीश चढ़ाने वाले उनके वीर जा रहे हों।‘
मेरे जीवन का लक्ष्य
प्रत्येक व्यक्ति की कोई आकांक्षा होती है। होश संभालने के साथ वह कुछ बनने की बात सोचने लगता है, उसकी आंखों में कुछ सपने पलने लगते हैं , जिन को साकार करने के लिए व कठोर परिश्रम करता है। साधनों की पहचान-व्यक्ति अपने जीवन का
लक्ष्य अपनी शारीरिक,बौद्धिक और मानसिक योग्यता और रुझान केअनुरोध करता है और यह आवश्यक भी है। इस दिशा में मुझे बच्चन जी की कविता की पंक्तियां याद आती है-
“पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले। कौन कहता है कि सपनों को ना आने दे ह्रदय में, देखते सब हैं इन्हें अपने समय में, अपनी उम्र में। स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो सत्य का भी ज्ञान कर ले।” और इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने एक पुलिस अधिकारी बनने का निश्चय किया है।
पेड़ों का महत्व
पेड़ हमारे जीवन का अस्तित्व हैं। पेड़ों के बिना धरती पर जीवन की कल्पना करना असंभव है। ये धरती पर अमूल्य सम्पदा के समान हैं। पेड़ों के कारण ही मनुष्य को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के संसाधन प्राप्त होते हैं। यदि पेड़ न हों तो पर्यावरण का संतुलन ही बिगड़ जाये और सब ओर तबाही मच जाये। आजकल मनुष्य विकास के नाम पर कंकरीट के जंगल बना रहा है और वे भी इस प्राकृतिक सम्पदा की कीमत पर।यदि पेड़ काटने के साथ-साथ इनका रोपण न किया गया तो इस ग्रह पर जीवन की संभावनायें ही खत्म हो जायेंगी।
समय की महानता
इस दुनिया में जो सबसे शक्तिशाली और कीमती चीज़ है, वो है हमारा समय। अगर एक बार यह कीमती समय चला जाता है, तो फिर यह हमेशा के लिए चला जाता है और कभी लौटकर नहीं आता है। समय सिर्फ आगे की दिशा में चलता है न कि पीछे की दिशा में क्योंकि समय हमेशा आगे बढ़ना ही सीखाता है। मनुष्य के पास समय की कोई कमान नहीं है। वह न ही समय को पीछे कर सकता, न ही समय को पकड़कर रख सकता है और न ही समय को आगे बढ़ा सकता। समय का न तो विश्लेषण किया जा सकता है और न ही इसकी आलोचना की जा सकती है। अक्सर यह देखा जाता है कि हम सभी समय के मूल्य और महत्व के बारे में जागरूक तो हो जाते हैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो जीवन की बुरी स्थितियों में अपना धैर्य खो बैठते हैं और अपने समय को बर्बाद करना शुरू कर देते हैं। इसीलिए एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि कभी भी अपना समय व्यर्थ न करें क्योंकि ये किसी के लिए भी नहीं रुकता और समय जब जाता है, तो बहुत कुछ सिखाकर भी जाता है।
सौर ऊर्जा
ज्यों ज्यों मानव सभ्यता प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर उन्नत स्वरूप बनाती गई त्यों त्यों ऊर्जा की खपत भी बढ़ती ही गई | आदिकाल में जहाँ व्यक्ति की आवश्यकताएं सिमित थी, लोग कम थे जिसके चलते कृत्रिम रूप से उत्पादित ऊर्जा की कभी आवश्यकता ही महसूस नहीं की गई| जैविक रूप से सुलभ ऊर्जा के भंडारों का उत्तरोतर दोहन इस द्रुतगती से हुआ कि आगामी एक सदी में ऊर्जा के समस्त परम्परागत स्रोत समाप्त हो जाएगे |
हमारी पृथ्वी के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य ही हैं, जिसके कारण हम देख पाते है प्रकाश की किरणों से रोशनी, उष्मा से ताप तथा जलवायु को संतुलित बनाने में सहायक हैं | इस तरह सूर्य की ऊष्मा का उपयोग विविध रूपों में किया जाता हैं | मगर सूर्य की ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा के रूप में रूपांतरित करने की तकनीक को सूर्य ऊर्जा संयंत्र कहा जाता हैं |
सरदार भगतसिंह
'भगत सिंह' का जन्म 28 सितंबर, 1907 मेँ पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव (जो अभी पाकिस्तान में है) एक सिख परिवार मेँ हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। भगतसिंह के जन्म के बाद उनकी दादी ने उनका नाम 'भागो वाला' रखा था। जिसका मतलब होता है 'अच्छे भाग्य वाला'। बाद में उन्हें 'भगतसिंह' कहा जाने लगा।
भगत सिंह बचपन से ही मेधावी थे। भगत सिंह 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रांतिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। भगत सिंह ने महात्मा गांधी जी से प्रेरित होकर उनके असहयोग आंदोलन में भाग लिया। वर्ष 1931 मेँ भगत सिंह को राजगुरु एवम सुखदेव के साथ फांसी दे दी गयी।
भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन मेँ सरदार भगत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस का परिचय दिया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है, जिस कारण उनका नाम अमर शहीदों में सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है।
प्रकृति कासंरक्षण हमारी जिम्मेदारी
धरती पर जीवन जीने के लिये भगवान से हमें बहुमूल्य और कीमती उपहार के रुप में प्रकृति मिली है। दैनिक जीवन के लिये उपलब्ध सभी संसाधनों के द्वारा प्रकृति हमारे जीवन को आसान बना देती है। एक माँ की तरह हमारा लालन-पालन, मदद, और ध्यान देने के लिये हमें अपने प्रकृति का धन्यवाद करना चाहिये। अगर हम सुबह के समय शांति से बगीचे में बैठे तो हम प्रकृति की मीठी आवाज और खूबसूरती का आनन्द ले सकते है। हमारी कुदरत ढ़ेर सारी प्राकृतिक सुंदरता से सुशोभित है जिसका हम किसी भी समय रस ले सकते है। पृथ्वी के पास भौगोलिक सुंदरता है और इसे स्वर्ग या शहरों का बगीचा भी कहा जाता है। लेकिन ये दुख की बात है कि भगवान के द्वारा इंसानों को दिये गये इस सुंदर उपहार में बढ़ती तकनीकी उन्नति और मानव जाति के अज्ञानता की वजह से लगातार ह्रास हो रहा है।
अगर हमें हमेशा खुश और स्वस्थ रहना है तो हमें स्वार्थी और गलत कार्यों को रोकने के साथ-साथ अपने ग्रह को बचाना होगा और इस सुंदर प्रकृति को अपने लिये बेहतर करना होगा। पारिस्थितिकीय तंत्र को संतुलित करने के लिये हमें पेङों और जंगलो की कटाई रोकनी होगी, ऊर्जा और जल का संरक्षण करना होगा आदि। अंत में प्रकृति के असली उपभोक्ता हम है तो हमें ही इसका ध्यान रखना चाहिये।
यदि मैं वैज्ञानिक होता
आज के युग को वैज्ञानिक युग कहा जाता है। इस युग में किसी व्यक्ति का वैज्ञानिक होना सचमुच बड़े गर्व और गौरव की बात है। वैसे तो अतीत-काल में भारत ने अनेक महान वैज्ञानिक पैदा किए हैं और आज भी विश्व-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक भारतीय वैज्ञानिक क्रियाशील हैं। अपने तरह-तरह के अन्वेषणों और आविष्कारों से वे नए मान और मूल्य भी निश्चय ही स्थापित कर हरे हैं। फिर भी अभी तक भारत का कोई वैज्ञानिक कोई एसा अदभुत एवं अपने-आप में एकदम नया अविष्कार नहीं कर सका, जिससे भारत को ज्ञान-योग के क्षेत्रों को समान विज्ञान के क्षेत्र का भी महान एवं मार्गदर्शक देश बन पता। इसी प्रकार के तथ्यों के आलोक में अक्सर मेरे मन मस्तिष्क में यह आन्दोलन होता रहा है कि यदि मैं वैज्ञानिक होता? वैज्ञानिक बनकर मैं मानवता का उद्धार और विस्तार करना चाहता हूँ, न कि नाम और यश कमाना।
आत्म-संगीत “मुंशी प्रेम चंद”
आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राण-पोषिणी घ्वनियॉँ इस निस्तब्ध और तमोमय दृश्य पर इस प्रकाश छा रही थी, जैसे हृदय पर आशाऍं छायी रहती हैं, या मुखमंडल पर शोक।
रानी मनोरमा ने आज गुरु-दीक्षा ली थी। दिन-भर दान और व्रत में व्यस्त रहने के बाद मीठी नींद की गोद में सो रही थी। अकस्मात् उसकी ऑंखें खुलीं और ये मनोहर ध्वनियॉँ कानों में पहुँची। वह व्याकुल हो गयी—जैसे दीपक को देखकर पतंग; वह अधीर हो उठी, जैसे खॉँड़ की गंध पाकर चींटी। वह उठी और द्वारपालों एवं चौकीदारों की दृष्टियॉँ बचाती हुई राजमहल से बाहर निकल आयी—जैसे वेदनापूर्ण क्रन्दन सुनकर ऑंखों से ऑंसू निकल जाते हैं।
सरिता-तट पर कँटीली झाड़िया थीं। ऊँचे कगारे थे। भयानक जंतु थे। और उनकी डरावनी आवाजें! शव थे और उनसे भी अधिक भयंकर उनकी कल्पना। मनोरमा कोमलता और सुकुमारता की मूर्ति थी। परंतु उस मधुर संगीत का आकर्षण उसे तन्मयता की अवस्था में खींचे लिया जाता था। उसे आपदाओं का ध्यान न था।
‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’
भारत माता के अमर सपूत सुभाषचंद्र बोस का जन्म उड़ीसा राज्य के कटक नामक नगर में 23 जनवरी 1897 में हुआ था। उनके पिता राय बहादुर जानकीनाथ बोस वहां की नगरपालिका एवं जिला बोर्ड के प्रधान तो थे ही, नगर के एक प्रमुख वकील भी थे। बालक सुभाष की आरंभिक शिक्षा एक पाश्चात्य स्कूल में हुई। कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा उतीर्ण करने के बाद प्रेसिडैंसी महाविद्यालय में प्रविष्ट हुए। वहां एक भारत-निदंक प्रोफेसर को चांटा रसीद करने के कारण निकाल दिए गए। उसके बाद स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढक़र कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बी.ए. ऑनर्स की डिग्री पाई। सन 1919 में सिविल परीक्षा पास करने इंग्लेण्ड गए और पास कर वापस भारत लौट आए। लेकिन बचपन से ही स्वतंत्रता प्रेमी होने के कारण ब्रिटिश सरकार की नौकरी से पिता के लाख चाहने-कहने पर भी स्पष्ट इंकार कर दिया।
आजाद हिंद सेना के सिपाही तथा अन्य सभी आदर से सुभाष बाबू जी को ‘नेताजी’ कहकर संबोधित करते हैं आज हम ‘जयहिंद’ कहकर परस्पर अभिवादन करते हैं यह सुभाष बाबु की ही देन है। भारत के इतिहास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम हमेशा अमर रहेगा।
यदि मैं प्रधान-मंत्री होता
मानव एक महत्त्वाकांक्षी प्राणी है। उसका लक्ष्य अपने जीवन को साथक बनाना है। जिसके हृदय में दृढ संकल्प अदम्य साहस और काम करने की लगन होती है वह अपने जीवन के लक्ष्य को अवश्य परा कर लेता है। बहुत से मानव जीवन की सार्थकता खाने-पीने और मौज-मस्ती मनाने में ही मानते है। ऐसे लक्ष्यहीन मानव का जीवन पशु तुल्य होता है। मुझे अपने भावी जीवन के लिए ऐसा लक्ष्य चुनना होगा जिससे न सिर्फ अपने जीवन को सख शान्ति मिले बल्कि समाज तथा राष्ट्र का भी कुछ हित हो सके । शिक्षण काल से ही मेरी रुचि राजनीति में रही है। मेरी चिर अभिलाषा देश का प्रधानमन्त्री बनने की रही है। इस गौरवपूर्ण एवं प्रतिष्ठित पद को पाना उतना ही कठिन है जितना सरल कहना । एक प्रसिद्ध लेखक के शब्दों में, “प्रधानमन्त्री की अन्य मन्त्रियों में वही स्थिति है, जो सितारों में चन्द्रमा की होती है।” अतः स्पष्ट है कि प्रधानमन्त्री संविधान एवं शासनप्रणाली में सबसे अधिक शक्तिशाली अधिकारी है।
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